आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री का परिचय

आवासीय वेदाध्ययन से अध्यापन और साधना तक।

आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री का जन्म बिहार के जमुई जिले में चकाई प्रखण्ड के कोराने गाँव में हुआ। उनके दादा और पिता कर्मकाण्ड तथा वैदिक अनुष्ठान करते थे। 16 मई 1998 को वे आवासीय वेदाध्ययन के लिए अयोध्या स्थित महर्षि महेश योगी आश्रम में प्रविष्ट हुए।

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शिक्षा, अध्यापन और कार्य का संक्षिप्त सार।

उनकी यात्रा कुछ स्पष्ट आधार-बिन्दुओं में समझी जा सकती है: आवासीय अध्ययन, गुरु-परम्परा, अध्यापन की ज़िम्मेदारी, विश्वविद्यालयीय उपाधियाँ और राउरकेला में निरन्तर कार्य।

  • आवासीय अध्ययन 16 मई 1998 से अयोध्या और प्रयागराज में वेदाध्ययन
  • अध्यापन दायित्व श्री एकनाथ वेद पाठशाला, पैठण में प्राचार्य के रूप में सेवा
  • औपचारिक उपाधियाँ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य
  • निरन्तर कार्य 2005 से राउरकेला में ज्योतिष, वास्तु, कर्मकाण्ड और आध्यात्मिक मार्गदर्शन
आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री का चित्र।
आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री
वैदिक अनुष्ठान और सार्वजनिक धार्मिक कार्य से सम्बद्ध दृश्य।
अनुष्ठान और अध्यापन कार्य से चुना गया अभिलेखीय चित्र।

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सम्मान और संस्थान

प्रतिष्ठित वैदिक और धार्मिक संस्थानों से सम्मान एवं सम्बद्धता।

आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री के व्यावसायिक परिचय में सम्मिलित संस्थागत सम्मान और सम्बद्धताएँ।

  • सम्मान वेदशास्रोक्त सभा (पुणे) द्वारा सम्मानित
  • संस्थान मुक्तेश्वर देवालय (जुहू, मुंबई)
  • सम्मान चातुर्वेद संस्थान (काशी), वाराणसी द्वारा सम्मानित

कोराने से आवासीय वेदाध्ययन तक।

धार्मिक शिक्षा और दैनिक अनुशासन उनके बचपन का हिस्सा थे। कक्षा 6 पूर्ण करने और कक्षा 7 में प्रवेश के बाद उनके पिता ने उन्हें पूर्णकालिक वैदिक शिक्षा के लिए अयोध्या भेजा।

इसके बाद प्रयागराज के ब्रह्मपुरी आश्रम में अध्ययन चला। 1999 में वैदिक मन्त्र, संध्यावन्दन, दुर्गासप्तशती, रुद्राध्याय और दैनिक धार्मिक अभ्यास की मौखिक परीक्षा के आधार पर उनका चयन महाराष्ट्र के अष्टविनायक कार्यक्रम के लिए हुआ।

उनकी शिक्षा का भौगोलिक क्रम

शिक्षा और कार्य का क्रम

  1. कोराने, बिहार

    श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ परिवार में पालन-पोषण, जहाँ पीढ़ियों से वैदिक कर्म और कर्मकाण्ड की परम्परा रही।

  2. अयोध्या

    आवासीय वेदाध्ययन के लिए महर्षि महेश योगी आश्रम में प्रवेश।

  3. प्रयागराज

    ब्रह्मपुरी आश्रम में विभिन्न विषयों के गुरुओं से वैदिक शिक्षा।

  4. अष्टविनायक कार्यक्रम

    वैदिक मन्त्र, संध्यावन्दन, दुर्गासप्तशती, रुद्राध्याय और दैनिक साधना की मौखिक परीक्षा से चयन।

  5. छत्रपति संभाजीनगर

    संत ज्ञानेश्वर वेद विद्या प्रतिष्ठान में पंडित दुर्गादास मुले जी के निर्देशन में यजुर्वेद, पाठ, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान की तैयारी और वास्तु का अध्ययन।

  6. एलोरा और घृष्णेश्वर क्षेत्र

    दत्तात्रेय परम्परा के श्री श्री 108 वामदेव सरस्वती जी से मन्त्र-दीक्षा और नियमित श्रीविद्या अध्ययन।

  7. पैठण

    श्री एकनाथ वेद पाठशाला के प्राचार्य के रूप में बारह विद्यार्थियों को वेदाध्ययन कराया। कांची कामकोटि परम्परा से जुड़े एक बड़े वैदिक आयोजन में उनके तीन विद्यार्थी चयनित हुए।

  8. महाराष्ट्र और वाराणसी

    घनपाठी वेदमूर्ति श्री नारायण गोडसे गुरुजी से वैदिक, मन्त्र और शतपथ ब्राह्मण (Shatpath Brahman) के अंशों का अध्ययन; गणित और फलित ज्योतिष; सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य उपाधियाँ।

  9. राउरकेला

    ज्योतिष, वास्तु, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान की तैयारी, श्रीविद्या और आध्यात्मिक मार्गदर्शन में कार्य।

प्रमुख गुरु

यजुर्वेद, कर्मकाण्ड और वास्तु

पंडित दुर्गादास मुले जी

संत ज्ञानेश्वर वेद विद्या प्रतिष्ठान के संस्थापक और प्रमुख। उनके निर्देशन में अध्ययन प्रत्यक्ष अनुष्ठान, वरिष्ठ गुरुओं के साथ यात्राओं तथा घरों, संस्थानों, कारखानों और औद्योगिक स्थलों के वास्तु-कार्य तक पहुँचा।

श्रीविद्या और मन्त्र-दीक्षा

श्री श्री 108 वामदेव सरस्वती जी

दत्तात्रेय परम्परा के संन्यासी और साधक, जिन्होंने उन्हें मन्त्र-दीक्षा और श्रीविद्या का नियमित प्रशिक्षण दिया।

वेद, मन्त्र और शतपथ ब्राह्मण (Shatpath Brahman)

घनपाठी वेदमूर्ति श्री नारायण गोडसे गुरुजी

उनके निर्देशन में वैदिक और मन्त्र अध्ययन आगे बढ़ा, जिसमें शतपथ ब्राह्मण (Shatpath Brahman) के अंश भी सम्मिलित थे।

उन्होंने क्या पढ़ा और पढ़ाया

वेद और यजुर्वेद

आवासीय पाठ, ग्रन्थ-अध्ययन, दैनिक आचार और गुरु द्वारा प्रत्यक्ष शुद्धि उनकी शिक्षा का आधार रहे।

कर्मकाण्ड

यज्ञ, पारिवारिक संस्कार और सामूहिक अनुष्ठानों की तैयारी, क्रम, सामग्री और प्रत्यक्ष भागीदारी।

वास्तु

घर, संस्था, कारखाना और औद्योगिक स्थल पर लागू होने वाला व्यावहारिक अध्ययन।

श्रीविद्या

दत्तात्रेय परम्परा में मन्त्र-दीक्षा और नियमित शिक्षा प्राप्त हुई, जिसका पालन उसी परम्परा की मर्यादा और अनुशासन में किया गया।

गणित ज्योतिष

ज्योतिषीय काल की गणना और निर्माण में प्रयुक्त गणितीय तथा खगोलीय अध्ययन।

फलित ज्योतिष

ग्रह-दशाओं, योगों तथा समय और व्यक्ति के विशिष्ट प्रश्न के सम्बन्ध की व्याख्या।

अध्यापन

पैठण में प्राचार्य रहते हुए बारह विद्यार्थियों को दैनिक वेदाध्ययन कराया।

शतपथ ब्राह्मण (Shatpath Brahman)

घनपाठी वेदमूर्ति श्री नारायण गोडसे गुरुजी के निर्देशन में इस प्रमुख वैदिक गद्य-ग्रन्थ के अंशों का अध्ययन।

शिक्षा और कार्य के चित्र।

ये चित्र धार्मिक कार्यक्रमों, सामूहिक अनुष्ठानों और पूर्व संस्थागत कार्य को दर्ज करते हैं।

उनकी पूर्व वैदिक शिक्षा और संस्थागत जीवन से जुड़ा फ्रेमयुक्त समूह-चित्र।
अध्ययन और अध्यापन के पूर्व काल का फ्रेमयुक्त संस्थागत समूह-चित्र।
औपचारिक अनुष्ठानिक अवसर पर आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री का फ्रेमयुक्त चित्र।

दृश्य अभिलेख में नया

हाल के पवित्र अनुष्ठान।

शिव-पूजन, यज्ञ, पुष्प-श्रृंगार और अनुष्ठान की तैयारी का नया दृश्य अभिलेख। चित्र और वीडियो अपने मूल रूप और फ्रेमिंग में प्रस्तुत किए गए हैं।

पवित्र सज्जा पूजन हेतु तैयार पुष्प, अर्पण-सामग्री और अनुष्ठानिक चिह्न।
अनुष्ठानिक अभिषेक अर्पण के समय पवित्र देव-विग्रह का अभिषेक।

अध्यापन, अनुष्ठान और साधना का दृश्य अभिलेख।

अध्यापन, सार्वजनिक पाठ, अनुष्ठानिक कार्य और पूजन-व्यवस्थाओं से चुने गए चित्र। प्रत्येक चित्र अपने मूल रिज़ॉल्यूशन में खुलता है।

औपचारिक अध्ययन और व्यावहारिक उत्तरदायित्व साथ-साथ विकसित हुए।

उनके कार्य में पाठ-अध्ययन, गणना, व्याख्या, अनुष्ठान-विधि, अध्यापन और व्यक्तिगत तथा संस्थागत प्रश्नों का दीर्घ अनुभव एक साथ जुड़ता है।

निजी परामर्श हेतु निवेदन